करू भात खाकर महिलाएं रखी निर्जला व्रत पति की दिघार्यु व संतानो की सुख-समृद्धि की कामना के लिए

तिल्दा नेवरा : तीजा सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है,तथापि इस पर्व को छत्तीसगढ़ अंचल में जिस प्रबल श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है वह अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। यहाँ की नारियां जिस व्यग्रता से तीजा की प्रतीक्षा करती हैं और तीजा मनाने के लिए मायके जाने की जैसी प्रबल अभिलाषा होती है,वह केवल छत्तीसगढ़ में देखा जा सकता है।

ज्ञात हो कि घनघोर वर्षा,नदी – नालों के बाढ़,कीचड़ और कांटे भरे रास्ते भी तीजहारिन को मायके जाने से नहीं रोक सकते।मात्र छत्तीसगढ़ में तीजा मनाने के लिए ब्याहता बेटियों,बहनों को मायके लाने की सुदृढ़ परंपरा है।
तीजा की पूर्व संध्या को तीज व्रत धारिणी करु भात ( करेला और भात) खाकर व्रत का आरम्भ करती हैं। उसके बाद उनका ३६ घंटे का निर्जला व्रत आरम्भ होता है।व्रत के पारणा के समय तीजहारिन को नवीन वस्त्र देकर सम्मानित किया जाता है। हम गर्व कर सकते हैं कि छत्तीसगढ़ तीजा में जिस प्रकार बेटियों को परम कल्याण के मार्ग – शिव की साधना में प्रवृत्त करता है,वह और कहीं नहीं।
करु भात का महत्व :
छत्तीसगढ़ में तीजा के प्रति निष्ठा अत्यन्त सुदृढ़ है।करु भात खाने की परंपरा का निर्वहन भी उतनी ही निष्ठा के साथ किया जाता है।
करु भात क्यों?
करु भात कोई रूढ़ि मात्र नहीं, ऋषियों की बताई हुई परंपरा है।इसमें एक गंभीर चिंतन निहित है। प्राचीन काल में ऋषि वैज्ञानिक होते थे। श्रृंखला बद्ध ज्ञान को विज्ञान कहते हैं। क्या,क्यों और कैसे का समाधान ढूंढते हुए सत्य तक पहुंचना विज्ञान है।
यह जगत तीन स्तरों का है – १/ भौतिक जगत जो दिखाई दे रहा है।२/ मानसिक जगत – यह भौतिक जगत से सूक्ष्म,विशाल और अधिक शक्तिशाली है।३/ आध्यात्मिक जगत – यह अति सूक्ष्म और अनंत है।इसकी शक्ति असीम है।
तीनों के अपने अपने विज्ञान हैं। भौतिक जगत के वस्तुओं की संरचना और गुण – धर्म की विवेचना को भौतिक विज्ञान ( Materialístic science) कहते हैं। मन – बुद्धि – चित्त की कार्य को समझने की विधि को मनोविज्ञान कहते हैं।
जीव,जगत और ब्रह्म के तात्विक ज्ञान को आध्यात्मिक विज्ञान कहते हैं।
ऋषियों को तीनों ही प्रकार के विज्ञान का ज्ञान था। उदाहरणार्थ – आयुर्वेद,कृषि,गोपालन, यातायात के लिए रथ निर्माण प्राच्य कालीन भौतिक विज्ञान के उदाहरण हैं। किसी योगी को जल के ऊपर चलते हुए,अत्यन्त भारी या फूल के समान हल्के हो जाते देखा जा सकता है।यह मनोविज्ञान की शक्ति है।इसे भौतिक विज्ञान नहीं समझ सकता। आध्यात्मिक विज्ञान पर ऋषियों का प्रमुख साध्य विषय था। “एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति” , “सर्व खल्विदं ब्रह्म” ,”सत्यं शिवं सुन्दरं ” अध्यात्म का ही उद्घोष है। प्राचीन वैज्ञानिक ऋषिगण तीनों प्रकार के विज्ञान का अनुसंधान करते थे। उन्होंने हो करु भात का निर्देश किया है। तीनों ही दृष्टि से करु भात महत्वपूर्ण है।
भौतिक विज्ञान की दृष्टि से – करेला भात खाने से आहार नली की शुद्धि होती है।उसके पश्चात उपवास रखने से पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है ,जिससे पाचक रस ( digestive enzymes) सक्रिय हो जाते हैं।
मनोवैज्ञानिक महत्व – मनुष्य की मनोकामना दो प्रकार की होती है – १/प्रेय मार्गी काम २/श्रेय मार्गी काम। जो प्रिय होता है वह प्रेय है और जो श्रेष्ठता दायक है वह श्रेय है। जो अच्छा लगता है वह प्रेय है और जो अच्छा होता है वह श्रेय है।सांसारिक सुखभोग प्रेय है,परमात्मा की प्राप्ति श्रेय है। प्रेयमार्ग भोग की ओर ले जाता है,श्रेयमार्ग योग (परमात्मा से मिलन ) की ओर ले जाता है। सामान्य जन भोग अर्थात प्रेय को पाना चाहते हैं परन्तु कल्याणकामी भोग का त्याग कर श्रेय को पाना चाहता है। तीजा व्रत कल्याण की साधना है अतः तीजहारिन प्रेय (सुस्वादु भोजन) का त्याग कर श्रेय ( कड़वा लेकिन स्वास्थ्यप्रद करेला) को ग्रहण करती है।करु भात खाती है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण :
तीजा व्रत शिव की साधना है। शिव की प्राप्ति भोग मार्ग से नहीं योग मार्ग से होती है।इसलिए शिव की साधना में मधुर सुस्वादु व्यंजनों का मोह त्यागकर अप्रिय लेकिन कल्याणकारी करेला को ग्रहण करने का विधान किया गया है।ऋषियों ने तीजहारिनों के लिए करु भात का निर्देश किया है।



