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पत्रकारों को करोडो की नोटिस देने वाली जशपुर जनसम्पर्क अधिकारी पर पत्रकारों का फुटा गुस्सा

जशपुर : छत्तीसगढ़ में जब जब भी शासन प्रशासन व व्यवसाईयो के गलत कार्यो, अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते हुए। सत्य को जनता के सामने समाचार प्रकाशन के माध्यम से लाया है। तब तब पत्रकारों को खुलेआम धमकी दिया जाता रहा है। तो कही कोई हमला या हत्या भी कर दिया गया है। कुछ अयसे ही घटना फिर प्रकाश मे आया है। वो मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के ग्रृह क्षेत्र व उनके ही विभाग के द्वारा जो जिला जशपुर के जनसम्पर्क अधिकारी के द्वारा स्थानीय पत्रकारों को करोडो रूपये की मानहानि का दावा करने का नोटिस जारी किया गया है। वो भी खुलेआम व्हाटसप के माध्यम से। जिससे पत्रकारिता जगत में भारी आक्रोश व्याप्त है।

गौरतलब हो कि छत्तीसगढ़ प्रदेश में फिर से पत्रकारों को धमकाने का मामला प्रकाश मे आया है। जहां देश मे पत्रकारों को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहा जाने वालो के ऊपर हमला करने की कोशिश अब सीधे जिला जशपुरनगर जनसम्पर्क अधिकारी के दफ्तर से की जा रही है। जहां सहायक संचालक जनसम्पर्क कार्यालय, नूतन सिदार ने पत्रकारों को सीधे धमकी भरा कानूनी नोटिस भेजकर पुरे छत्तीसगढ़ के पत्रकारिता जगत में फिर से एक नया भूचाल ला दिया है।

अब सोचने वाली बात यह है कि क्या नूतन सिदार ने यह नोटिस भेजने से पहले शासन/प्रशासन से अनुमति ली थी?अगर अनुमति नहीं ली गई। तो क्या यह कदम सेवा आचरण नियमों का खुला उल्लंघन नहीं है?
जानकारों की माने तो यह कृत्य सरकारी सेवा नियम स्पष्ट कहते हैं कि कोई भी शासकीय कर्मचारी यदि अपने पदनाम का इस्तेमाल करते हुए। किसी प्रकार की कानूनी कार्यवाही करता है। तो उसे उच्च अधिकारी से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होता है। लेकिन यहाँ तो अधिकारी स्वयं ही पत्रकारों को डराने-धमकाने में जुट गईं। इस पर सभी पत्रकार संगठनों ने इसे सीधा हमला बताया है। उनका कहना है कि
एक ओर तो सरकार पत्रकार सुरक्षा कानून की बात करती है। लेकिन यहां मुख्यमंत्री के क्षेत्र से व उनके ही विभाग के सरकारी अधिकारी ही पत्रकारों को सीधे धमका रहे हैं। क्या यही है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता? क्या यही है लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका? आखिर कब तक चलता रहेगा यह दमनकारी प्रशासन की कार्यप्रणाली।

बता दे कि इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं। पत्रकारों पर आरोप मढ़कर, ब्लैकमेलिंग का ठप्पा लगाकर और मानहानि का मुकदमा ठोंककर प्रशासन के कुछ लोग सच को दबाना चाहते हैं। पर पत्रकारों को अयसा करना अधिकारियों को भारी पड सकता है। क्योंकि पत्रकारों का मुख्य अस्त्र है कागज और कलम। जीसके माध्यम से सभी प्रदेश के पत्रकार इसके विरोध मे लामबंद होने के लिए एकजूट हो चुके हैं। जिसका असर जल्द ही पुरे छत्तीसगढ़ में नजर आयेगा।
क्योंकि यह मामला केवल एक नोटिस का नहीं है। अब यह मामला लोकतंत्र में पत्रकारिता की आज़ादी बनाम अधिकारीशाही की दबंगई का है। यदि बिना अनुमति लिए नोटिस भेजने पर कोई कार्रवाई नहीं होती है। तो यह सीधा संदेश होगा कि प्रशासन स्वयं अपने अधिकारियों को पत्रकारों पर अत्याचार करने की खुली छूट दे रहा है। इससे यही पता चलता है।

ज्ञात हो कि अब यह आग तभी बुझेगी जब उक्त अधिकारी को उसके द्वारा करोडो के मानहानि की नोटिस जारी किया गया है। उसे तत्काल वापस लेने को कहा जाय। इसके साथ ही उनके उपर अनुशासनात्मक कार्यवाही भी किया जाये। ताकि आगे किसी और को यह कदम न उठा सके। ताकी पत्रकारों को सरकार व प्रशासन के उपर विश्वास व सहयोग मीलता रहे। अन्याथा यह चिंगारी एक बडा भयंकर आग मे तब्दील होते देर नही लगेगी। जो प्रदेश में असर डालेगा। जिसका प्रभाव सरकार व प्रशासन दोनो पर पडेगा।

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