
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहना नाम मात्र का या फिर सरकार का दिखावा है भारत में पत्रकारिता के लिए कोई मसौदा, व्यवस्था व सुरक्षा नही इस पर सरकारे मौन क्यों? रायपुर, (संवाददाता – मनोज शुक्ला) 23 जूलाई 2025 : हमारे भारत देश में पत्रकारिता व पत्रकारों के प्रति राज्य सरकारें हो या फिर केन्द्र सरकार इस पर मौन रह कर मुठ्ठी बांध कर क्यो नजर आता है। क्योंकि वर्तमान समय में चाहे कही भी हो कोई भी हो और किसी भी स्तर पर हो, पत्रकारिता करना,वह भी बिना निश्चित सैलरी के,किसी आर्थिक युद्ध लड़ने जैसा ही है।हम देखते हैं कि एक फ्रीलांसर पत्रकार को रोज़ाना ख़बरों की तलाश में निकलना होता है। मगर बदले में न तो स्थायी आय मिलती है। न सामाजिक सुरक्षा। बता दे कि वही दुसरी तरफ देखे तो निजी चैनल और अख़बार अपनी टीआरपी और रीडरशिप बढ़ाने के लिए फ्रीलांसरों का इस्तेमाल तो करते हैं। पर मेहनताना देने में पीछे हट जाते हैं। जबकी देखा जा सकता है कोई एक ज़मीनी पत्रकारिता करने वालों को पेट्रोल तक का खर्च अपनी जेब से उठाना पड़ता है। ऊपर से उपकरण, इंटरनेट, यात्रा और रिपो
रायपुर, (संवाददाता – मनोज शुक्ला) 23 जूलाई 2025 : हमारे भारत देश में पत्रकारिता व पत्रकारों के प्रति राज्य सरकारें हो या फिर केन्द्र सरकार इस पर मौन रह कर मुठ्ठी बांध कर क्यो नजर आता है। क्योंकि वर्तमान समय में चाहे कही भी हो कोई भी हो और किसी भी स्तर पर हो, पत्रकारिता करना,वह भी बिना निश्चित सैलरी के,किसी आर्थिक युद्ध लड़ने जैसा ही है।हम देखते हैं कि एक फ्रीलांसर पत्रकार को रोज़ाना ख़बरों की तलाश में निकलना होता है। मगर बदले में न तो स्थायी आय मिलती है। न सामाजिक सुरक्षा।
बता दे कि वही दुसरी तरफ देखे तो निजी चैनल और अख़बार अपनी टीआरपी और रीडरशिप बढ़ाने के लिए फ्रीलांसरों का इस्तेमाल तो करते हैं। पर मेहनताना देने में पीछे हट जाते हैं। जबकी देखा जा सकता है कोई एक ज़मीनी पत्रकारिता करने वालों को पेट्रोल तक का खर्च अपनी जेब से उठाना पड़ता है। ऊपर से उपकरण, इंटरनेट, यात्रा और रिपोर्टिंग में लगने वाला समय सब कुछ बिना किसी तय पारिश्रमिक के होता है।
गौरतलब हो कि पुरे देश में इस तरह की यह व्यवस्था सभी स्तर के पत्रकारों को धीरे-धीरे आर्थिक रूप से तोड़ देती है। जिससे कई पत्रकार कर्ज़ में डूब जाते हैं। तो कुछ को मजबूरी में ही पेशा भी छोड़ना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है। कि क्या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ केवल दिखावे भर का रह गया है? क्या ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों को यूं ही आर्थिक तंगहाली में जीना पड़ेगा? क्या सरकार को इस पर ध्यान नही देना चाहिए? बहरहाल
ये हालात पत्रकारों की गरिमा और लोकतंत्र दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। कब समझे सरकारे, कब तक पत्रकारों को यू ही अपने भरोसे बीना किसी आय व्यवस्था के जीवन जिये !





