
खबर का असर हास्पिटल में ही फर्श पर बच्चे को जन्मदेने जैसी मामले में नर्स निलंबित
अब मांग है विकासखंड स्तर के अधिकारियों पर भी हो जांच यह सिर्फ खानापूर्ति से असंतुष्ट लोग
सूरजपुर : छत्तीसगढ़ के भटगांव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बीते 9 अगस्त को ओड़गी विकासखंड की श्रीमती कुन्ती पंडो को प्रसव पीड़ा में हास्पिटल पहुंचने के बाद भी फर्श पर नवजात को जन्म देने की शर्मनाक घटना ने स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही को बेनकाब कर दिया है। चार-पांच घंटे तक दर्द से तड़पती रही प्रसव पीड़ा से मां। लेकिन हास्पिटल में न डॉक्टर मौजूद था, न नर्स और न ही कोई अन्य स्टाफ। इस अमानवीय लापरवाही पर अब कार्रवाई तेज हो गई है, लेकिन सवाल उठ रहे हैं कि क्या जांच सिर्फ अस्पताल के लोकल स्टाफ तक सीमित रहेगी, या विकासखंड स्तरीय और निगरानी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों व कर्मचारियों की भूमिका पर भी गाज गिरेगी?वहीं दूसरी तरफ अब तक सार्वजनिक रूप से प्राप्त जानकारी अनुसार स्वास्थ्य विभाग दावा करता है कि जांच निष्पक्ष है, लेकिन स्थानीय जानकारों का मानना है कि बिना ऊपरी स्तर की जवाबदेही तय किए सुधार संभव नहीं। अगर जांच सिर्फ अस्पताल तक सीमित रही, तो यह महज खानापूर्ति साबित होगी। अब शासन से उम्मीद है कि दायरा बढ़ाकर सिस्टम की जड़ों तक पहुंचे, ताकि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में सच्चा सुधार हो सके।
इस मामले में जांच रिपोर्ट के बाद निलंबन की तलवार किस किस पर :
ज्ञात हो कि जिला स्तरीय समिति की जांच रिपोर्ट में स्टाफ नर्स श्रीमती शीला सोरेन को बिना पूर्व स्वीकृति के अवकाश लेकर अनुपस्थित रहने का दोषी ठहराया गया। इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए उन्हें छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम 1966 के तहत निलंबित कर दिया गया। इससे पहले अस्पताल की आरएचओ (महिला) श्रीमती विक्टोरिया केरकेट्टा को भी सस्पेंड किया जा चुका है। मेडिकल ऑफिसर के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा करते हुए रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है। लेकिन क्या यह जांच विकासखंड स्तर के अधिकारियों तक पहुंचेगी, जो अस्पताल की निगरानी और संसाधनों के लिए जवाबदेह हैं? या फिर इतने में ही सिमट कर रह जाएगी, जैसी अक्सर ऐसी घटनाओं में देखा जाता है?
स्वास्थ्य मंत्री का सख्त तेवर बावज़ूद अब भी सवाल बरकरार:
बता दे कि जिला प्रशासन द्वारा जारी अधिकृत विज्ञप्ति में उल्लेख किया गया है कि स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने घटना पर कड़ी नाराजगी जताते हुए तत्काल जांच के आदेश दिए थे।मंत्री के निर्देश पर जिला समिति ने रिपोर्ट सौंपी, लेकिन स्थानीय रहवासियों का कहना है कि लापरवाही की जड़ें ब्लॉक स्तर तक फैली हैं। विकासखंड अधिकारियों की निगरानी में कमी और स्टाफ की अनुपस्थिति की पूर्व जानकारी न होने पर सवाल उठ रहे हैं। क्या जांच का दायरा बढ़ाकर ब्लॉक स्वास्थ्य अधिकारी (बीएमओ) या अन्य निगरानी कर्मियों तक पहुंचेगा, या सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाकर मामला रफा-दफा कर दिया जाएगा?
इस घटना ग्रामीण स्वास्थ्य की पोल खोल के रख दी है:
अवगत हो कि यह घटना ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति का आईना है। संसाधनों की कमी, स्टाफ की अनुपस्थिति और निगरानी की लापरवाही का नतीजा त्रासदी उभर कर सामने आई हैं। कुंती पंडो की पीड़ा उन ग्रामीण महिलाओं की कहानी है, जो सरकारी अस्पतालों पर भरोसा कर आती हैं, लेकिन मिलता है सिर्फ दर्द और उपेक्षा। जांच कमेटी ने लोकल स्टाफ पर कार्रवाई की, लेकिन क्या विकासखंड स्तर के जवाबदेह अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल होगी? अगर नहीं, तो क्या ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रुकेगी? समाज और सरकार से यही सवाल है। आखिर कब तक माएं फर्श पर तड़पकर मातृत्व का हक मांगती रहेंगी?





