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ब्रेकिंग : सच दिखाने का परिणाम पत्रकार पर खुलेआम अमरकंटक में ‘बंदूक’ धारी माफिया ने किया हमला

जीपीएम/अमरकंटक :
जब सत्ता मौन साध ले और कानून केवल फाइलों तक सिमट जाए, तब माफियाओं के हौसले पहाड़ों से भी ऊँचे हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित पवित्र अमरकंटक मैकल बायोस्फियर रिजर्व आज अपनी हरियाली, नदियों और आस्था से अधिक खनन माफिया के खौफ के लिए पहचाना जा रहा है। ताज़ा घटना ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा हमला किया है। अवैध उत्खनन की सच्चाई उजागर करने पर पत्रकार सुशांत गौतम को जानलेवा हमले का सामना करना पड़ा।
यह हमला किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पत्रकारिता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जनता के सूचना के अधिकार पर सीधा प्रहार माना जा रहा है।

सच को कुचलने कैमरे को चुप कराने खुल कर उतरा माफिया :

गौरतलब हो कि घटना 8 जनवरी की है। शाम करीब 6 बजे, पत्रकार सुशांत गौतम अपनी टीम के साथ मैकल पर्वत श्रृंखला में हो रहे अवैध उत्खनन की फोटो और वीडियो रिकॉर्ड कर लौट रहे थे। तभी धनौली क्षेत्र में खनन माफिया ने उनकी गाड़ी को घेर लिया।
सामने एक सफेद कार, एक ओर भारी हाईवा और पीछे से तीसरी गाड़ी कुछ ही पलों में सड़क जंग का मैदान बन गई। माफियाओं ने लोहे की रॉड से हमला किया, गाड़ियों के शीशे तोड़े और पत्रकार को लहूलुहान कर दिया। साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से मोबाइल फोन भी छीन लिया गया। हमले के दौरान जान से मारने की धमकियाँ दी गईं।
नामजद आरोपी, फिर भी बेखौफ मामले में FIR क्रमांक 0014/2026 दर्ज की गई है। नामजद आरोपियों में
जयप्रकाश शिवदासानी (जेठू), सुधीर बाली और लल्लन तिवारी शामिल हैं। जिसमे
भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराएँ 126(2), 296, 115(2), 351(3), 324(4), 304, 3(5) इस बात की पुष्टि करती हैं कि यह हमला पूर्व नियोजित और संगठित था। इसके बावजूद अब तक ठोस कार्रवाई न होना प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े करता है।

प्रशासनिक चुप्पी पर उठ रहे की सवाल :

बता दे कि इस घटना मे मरवाही वनमंडल की रिपोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि पमरा क्षेत्र में क्रेशर माफिया नियमों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ा रहा है।
बायोस्फियर रिजर्व में भारी मशीनों का उपयोग
250 मीटर की अनिवार्य दूरी का उल्लंघन
डायनामाइट से पहाड़ों को छलनी करना
यह सब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद जारी है। सवाल यह है कि वन विभाग की चेतावनी के बाद भी अनूपपुर खनिज विभाग ने उत्खनन क्यों नहीं रोका? क्या माफिया को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है?

इस जानलेवा हमले के बाद भी पत्रकार सुशांत गौतम का बयान व्यवस्था के लिए चुनौती बन गया है। उन्होंने कहा “यह हमला उनकी बौखलाहट है। वे सच से डरते हैं। झूठे केस और धमकियाँ दी जा रही हैं, लेकिन मैकल की बर्बादी का सच दबेगा नहीं।”
यह बयान बताता है कि शरीर घायल हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता की आत्मा नहीं।
अब आर-पार की लड़ाई
मैकल पर्वत केवल पत्थरों का ढेर नहीं है। यहीं से नर्मदा, सोन और जोहिला जैसी नदियों का उद्गम होता है। यह करोड़ों लोगों की आस्था और आने वाली पीढ़ियों की प्राकृतिक धरोहर है।

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आज यदि सच दिखाने पर एक पत्रकार को सड़क पर घेरकर पीटा जा सकता है, तो कल कोई भी आम नागरिक सुरक्षित नहीं रहेगा। अब समय केवल कागजी कार्रवाई का नहीं, बल्कि तत्काल गिरफ्तारी, अवैध क्रेशरों पर सख्त कार्रवाई और पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का है।
अन्यथा यह मान लिया जाएगा कि अमरकंटक में संविधान नहीं, बल्कि माफिया का समानांतर शासन चल रहा है।

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