
पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा के दो RTI से खुलने लगे ग्राम पंचायतों के ‘वित्तीय रहस्य
रायगढ़/लैलूंगा : पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के कार्यकलापों में पारदर्शिता और जवाबदेही की पड़ताल को लेकर वरिष्ठ पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा ने छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले की ग्राम पंचायतों में सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत दो महत्वपूर्ण आवेदन दाखिल किए हैं। इन आवेदनों का दायरा न केवल स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था को उजागर करता है, बल्कि 15वें वित्त आयोग के नाम पर खर्च हुई राशि के उपयोग और स्थानीय क्लिनिकों के संचालन जैसे संवेदनशील और जनहित से जुड़े विषयों को सामने लाने का प्रयास करता है। प्रथम पारदर्शिता पर सवाल रहा:
ग्राम पंचायत – केशला, लैलूंगा
, जन सूचना अधिकारी – परखित भोय, सचिव जी.पी.
, आवेदन क्रमांक – 220250723012933
मूल मांग:
रायगढ़ जिले में मान्यता प्राप्त सभी क्लिनिकों की सूची मांगी गई है, जिसमें संचालक का नाम, पता और मोबाइल नंबर जैसी जानकारी शामिल है।
गौरतलब हो कि यह मांग सीधे तौर पर ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में फर्जी क्लिनिकों और अवैध चिकित्सा व्यवसाय के संचालन की आशंका पर केंद्रित है। यदि यह सूचना उपलब्ध होती है, तो इससे जिले में झोला-छाप डॉक्टरों की संख्या और उनके खिलाफ कार्रवाई की स्थिति को उजागर किया जा सकता है। यह विषय स्वास्थ्य सुरक्षा और मेडिकल माफियाओं की पहचान के लिए अहम है।
द्वितीय आरटीआई -“15वें वित्त आयोग की राशि का हिसाब!” ग्राम पंचायत – राजपुर, लैलूंगा
, जन सूचना अधिकारी – परखित भोय, सचिव जी.पी.
, आवेदन क्रमांक – 220250604001463
जाने क्या मूल मांग रही :
1 अप्रैल 2021 से 31 मार्च 2025 के बीच 15वें वित्त आयोग के अंतर्गत ग्राम पंचायत को मिली राशि से खर्च की गई रकम के मूल GST बिलों की प्रमाणित छायाप्रति मांगी गई है।यह मांग सीधे-सीधे ग्राम पंचायतों में विकास के नाम पर की जा रही ‘कागजी खानापूर्ति’ और भ्रष्टाचार को चुनौती देती है। ग्राम पंचायतें आमतौर पर इन फंडों का उपयोग नाली निर्माण, सड़क मरम्मत, सामुदायिक भवन, जल व्यवस्था आदि में दिखाती हैं, लेकिन वास्तविक कार्य की स्थिति अक्सर शून्य या अधूरी होती है। यदि यह बिल सार्वजनिक होते हैं तो यह प्रमाणित किया जा सकेगा कि क्या वाकई विकास के लिए राशि खर्च हुई या केवल कागजों पर ही निर्माण कर दिखाया गया।
पारदर्शिता की जंग में ‘सूचना का अधिकार’ बना हथियार :
पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा द्वारा उठाए गए ये दोनों मुद्दे ग्राम पंचायत स्तर के वित्तीय और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन चेतना का मजबूत औजार बन सकते हैं।
* यदि समय पर सूचना नहीं दी जाती या जानकारी अधूरी दी जाती है, तो यह सूचना आयोग में चुनौती का आधार बन सकता है।
* वहीं यदि दस्तावेज मिलते हैं, तो यह मीडिया, समाजसेवियों और जनप्रतिनिधियों के लिए स्थानीय शासन में पारदर्शिता लाने का हथियार बन सकते हैं।
इस संबंध में जाने क्या कहता है कानून?
RTI की धारा 6(1): कोई भी नागरिक सूचना मांग सकता है।
* धारा 7(9): सूचना उस रूप में मांगी जा सकती है जो आवेदक को सुविधाजनक हो।
* धारा 6(3): यदि सूचना अन्य विभाग के अधीन हो, तो उसे हस्तांतरित किया जाए।
* धारा 5(2): सहायक जन सूचना अधिकारी को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
जाने अब इसके आगे क्या?
* इन दोनों आवेदनों की स्थिति “Under Process” है, लेकिन यदि पंचायत विभाग जवाब देने में हीला-हवाली करता है या अधूरी जानकारी देता है, तो यह सवाल उठेंगे कि आख़िर पंचायतें अपने खर्चों से क्यों डरती हैं?
* यह रिपोर्ट ग्रामीण भारत के उन अनगिनत हिस्सों की कहानी कहती है, जहाँ “विकास” केवल बजट की किताबों में होता है, ज़मीन पर नहीं।यदि आप भी अपने गांव, पंचायत या क्षेत्र में इस प्रकार की जानकारी पाना चाहते हैं, तो RTI एक सशक्त माध्यम है पूछिए सवाल, क्योंकि जवाब देना उनका कर्तव्य है!





